तीरूकूड़ंताई आरावमुदन

Aravamudan

दिव्य देश का इतिहास अदभुत है| कृरुगुर सडगोपन जी (नम्माल्वार) का जन्म कलियुग के शुरूआत में हुआ था जबकि नाथमुनिगल जी का जन्म उनसे कई सहस्त्राब्दियों बाद हुआ| कृरुगुर सडगोपन जी द्वारा लिखित प्रभु के १० वैष्णव भजन नाथमुनिगल जी ने सुने| कृरुगुर सडगोपन जी ने अपने दसवें भजन में लिखा की यह भजन श्री कृरुगुर से उधृत है| जबकि नाथमुनिगल जी ने सुनते हुए ही समझ लिया था की यह भजन वही से सम्बन्ध रखते होंगे| नाथमुनिगल जी कुरुगुर गए और वहां श्री मधुरकवि के प्रपौत्र से मिले और ‘कन्निनुं सिरु ताम्बु’ अमृतवचन प्राप्त किये| वो इसे लगातार भजने लगे और भजते ही रहे| एक चमत्कार हुआ और श्री कृरुगुर सडगोपन जी ने नाथमुनिगल को दर्शन दिए| और उन्हें ४००० प्रभु भजन आशीर्वाद के रूप में दिए| जो की आज ‘नालायिरा दिव्य प्रबन्धं’ के रूप में आनंद से सुने जाते हैं||

१२ आल्वार में से चौथे आल्वार थिरुमल्सई थे| वे थिरुकुदंथई गए| उन्होंने मंदिर में प्रवेश करने के पहले परिक्रमा करने के लिए विचार किया| जैसे ही उन्होंने परिक्रमा प्रारम्भ किया, वैसे ही प्रभु आराव्मुधपिरान भी उनकी दिशा में उन्हें देखने लगे| उनके मंदिर में प्रवेश करते ही उन्होंने प्रभु आराव्मुधपिरान को आदेश दिया की वे उठें और उनसे बात करें| प्रभु, आल्वार की बात को सहमति देते हुए अपनी शय्या से उठने लगे| आल्वार अचम्भित हो गए और प्रभु से बोले आप लेटे रहिये भगवन्| प्रभु आराव्मुधपिरान आधे उठे हुए स्थिति में ही अपने भक्तों को आशीर्वाद देते हैं| आल्वार के अनन्य प्रेम की वजह से – प्रभु ने उनके साथ अपने नाम बदल लिया| और वे अब आराव्मुदाल्वार और थिरुमाल्सैपिरान के नाम से जाने जाते हैं|"

१२ आल्वार में से अंतिम आल्वार श्री थिरुमन्गैअल्वार थे| उन्होंने प्रभु आराव्मुदन पर ‘थिरुवेलुकुत्रिरुक्कई’ भजन गाया| यह भजन अदभुत रूप से व्यवस्थित है और भगवान् के रथ की तरह सुप्रबंधित है| यह भजन संगीत के सुरों की तरह चढ़ते उतरते रूप में है जैसे – १ २ १, १ २ ३ २ १, १ २ ३ ४ ५ ४ ३ २ १..

 

मंदिर विवरण -

 

यह मंदिर कुम्ब्कोनम रेलवे स्टेशन से १.५ मील की दूरी पर है|

मूलवर, सारंगबानी के नाम से जाने जाते हैं| प्रभु सारंगबानी आधे उठे हुए स्थिति में आधिशेष के ऊपर पूर्व दिशा में मुख करके लेटे हुए हैं|

प्रभु सारंगबानी का विवाह कोमल्वल्ली थायर से हुआ था जो की हेमरिषी के यहाँ जन्मी थी| उन्होंने प्रभु से विवाह के लिए कड़ी तपस्या की थी|, प्रभु का मुख्य मंदिर एक रथ की तरह सुसज्जित है जिसे की हाथी खींचते हैं|

प्रभु के कुल ५१ भजन हैं|

|| श्रीमते रामानुजाय नमः ||

 

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